Hindi News: इलाहाबाद। कहावत है कि 'कोस-कोस पर बदले पानी आठ कोस पर बानी', यह कहावत भारतीय संस्कृति की विविधता की परिचायक है। विविधता दीपावली के त्यौहारों में भी दिखती है। पूरे अवध क्षेत्र में यह त्योहार अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। यह विविधता पूजन विधियों से लेकर त्योहार की अवधि तक में है।
अवध क्षेत्र में दीपावली का पर्व पूरे कार्तिक मास तक मनाया जाता है। इस दौरान पंद्रह दिनों तक मिट्टी के कच्चे दिए में घी डालकर बाती जलाई जाती है। इसके बाद मिट्टी के पक्के दीपक जलाने की परंपरा है। यह दीपक घर के आंगन, तुलसी, नीम, पीपल के पेड़ के नीचे, घूर (जहां गोबर व कूड़ा इकट्ठा किया जाता है) पशुशाला, कुंआ, जलाशय आदि के पास जलाए जाते हैं।
इस मान्यता के बारे में धर्म ज्ञानोपदेश संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी बताते हैं कि रामचरितमानस में प्रसंग है कि कार्तिक माह में राजा राम लंका को जीतने और वनवास की अवधि खत्म होने के बाद सीता और भाइयों के साथ अयोध्या की ओर चल पड़ते हैं। पूरे अवध क्षेत्र में इस बात की खुशी होती है कि अब राम राच्य आने वाला है। इसी खुशी में राम के आने के दिनों से लेकर ताजपोशी से एक दिन पहले तक कच्ची मिट्टी के दिए और फिर ताजपोशी से लेकर अमावस्या बीतने तक मिट्टी के पक्के दिए जलाए जाते हैं। इसके साथ ही एक वैज्ञानिक तर्क भी है कि यह क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र है और कार्तिक महीना पूजा पाठ के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस महीने से पहले क्वार को वर्षा का महीना माना जाता है।
वर्षा के समय पैदा हुए कीट पतंगों और कीटाणुओं को मारने के लिए जगह-जगह घी के दिए जलाए जाने की परंपरा है।
Source- News in Hindi
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