मथुरा, [भारतपाल सिंह]। दुनिया में भ्रातृ प्रेम। राम और भरत से आगे कुछ नहीं। भाइयों का ऐसा प्रेम न हुआ और भविष्य में भी शायद रिक्त स्थान ही रहे। इसकी वजह भी है कि रिश्ते बदल गए हैं। जर, जोरू और जमीन के चलते इनमें खून की धार भी बहने लगी है। इसके बाद भी एक ऐसे भाई हैं, जिन्होंने 'छोटे' के लिए श्रीराम की भूमिका निभाई। उस पर भरत की तरह प्यार बरसाया। अपने लिए जो हासिल न कर सके, उसे अपने भाई को हासिल कराया, तभी फुर्सत की बांसुरी बजाई।
महावन तहसील के गांव कासिमपुर के साधारण किसान परिवार में जन्मे जितेंद्र सिंह पढ़ने-लिखने में शुरू से तेज थे। पढ़ाई के दौरान उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू की। मेहनत की लेकिन भाग्य की लकीर शायद थोड़ी छोटी थी।आइएएस की तैयारी करने के वक्त के आखिरी क्षणों तक जीतोड़ मेहनत के बाद भी परीक्षा के कठोर नारियल को तोड़ न सके। उस वक्त ही मन में प्रण ले लिया, 'मैं नहीं तो छोटा भाई'। अपने से 14 साल छोटे भाई सुरेंद्र सिंह को आइएएस बनाने की ठान ली।
सिर्फ वचन नहीं लिया, इसे कर्म की आग में तपाने की कोशिश भी तेजी से आगे बढ़ने लगीं। वह आगरा कालेज से एलएलबी करने के दौरान ही हर शनिवार को साइकिल से गांव जाते। शनिवार रात व रविवार को पूरे दिन सुरेंद्र को पढ़ाते थे, सोमवार को वह फिर आगरा साइकिल से ही लौटते। यह सिलसिला करीब चार साल तक चला। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही दिलाकर उन्होंने सुरेंद्र को दिल्ली के गवर्नमेंट मॉडल स्कूल में एडमिट करा दिया। वहां कक्षा नौ से 12वीं तक शिक्षा दिलाई। उन्हें लगा कि उनके दूर रहने से भाई की शिक्षा में कोई अड़चन आ सकती है, इसलिए जितेंद्र ने भी नौकरी के प्रयास शुरू कर दिए। जल्द केंद्र सरकार में नौकरी मिल भी गई। इस बीच, उनका तबादला जयपुर हो गया। वहां सुरेंद्र सिंह को भी बुला लिया। राजस्थान विश्वविद्यालय से सुरेंद्र सिंह को बीएससी व एमएससी कराई, साथ ही भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू करा दी।
Source- News in Hindi
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